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तीन फेरे बाद
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आज के दौर में आंचलिक उपन्यास और कथानक देखने को बहुत ही कम मिलते हैं। लेकिन डाॅ॰ प्रदीप गुप्ता के उपन्यास ’तीन फेरे बाद’ ने आंचलिक विद्या के विद्वान स्व॰ फनेश्वर नाथ रेणू की याद दिला दी है। आज बाजार में जासूसी उपन्यास और शहरी जीवन पर आधारित रचनाओं की भरमार है। ग्रामीण पृष्ठभूमि की आजकल बहुत ही कम रचनाएं देखने को मिल रही हंै। प्रस्तुत उपन्यास में ग्रामीण संस्कृति एवं रहन सहन के रंग तो देखने को मिलते ही हैं, साथ में शहरी जीवन का तुलनात्मक स्वरूप भी देखने को मिलता है। ज्यादातर लेखक जिनका जन्म गांव या कस्बों में हुआ, उनकी सोच और लेखन में उस स्थान और वहां के रहन सहन, रस्म रिवाज, प्राकृतिक व भौगोलिक स्थिति का जीवंत चित्रण मिलता है। मुंशी प्रेमचंद की सारी की सारी रचनाएं गांव से निकलती है। उनके ज्यादातर पात्रों के नाम में भी गांव के ही समावेशी होते हैं। हिन्दू संस्कृति में शादी में वर-वधु को सात फेरेे लेने पड़ते हैं। इन सात फेरांें में सात वचनों का पालन और उसके कर्तव्य का पाठ नव दम्पती को पढ़ाया जाता है। प्रस्तुत उपन्यास में संयोगवश दो बार ऐसा प्रसंग आता है कि शादी की रस्में तीन फेरे होकर रुक जाती हैं। आमतौर पर ऐसा अन्यत्र देखने को नहीं मिलता है। और सच भी यह है कि तीन फेरों से शादी की सम्पूर्ण रस्म पूरी नहीं मानी जाती। अलग-अलग विद्वानों ने सात फेरों के महत्व को अपने - अपने तरीके से वर्णित किया है। मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि शादी बिना फेरों के भी सम्भव है। आजकल कोर्ट और मंदिरों में वर-वधु माला पहना कर शादी कर लेते हैं। फिल्म क्रान्ति में मैंने प्यार की परिभाषा इस प्रकार दी थी कि ’लाख गहरा हो सागर तो क्या प्यार से कुछ भी गहरा नहीं’ जिसे भारत के जन जन ने सराहा। इससे स्पष्ट है कि प्यार की गहराई आकाश पाताल की लम्बाई में या गज या मीटरों में नहीं मापी जा सकती। दो प्रेमियों के मन का सच्चा मिलन भी पारम्परिक शादी से ज्यादा अटूट बंधन हो सकता है। प्रस्तुत उपन्यास ’तीन फेरे बाद’ में पहली घटना उस समय घटती है जब जमींदार का प्रमुख नौकर बहादुर बेमेल शादी कराने पर तुला होता हैं। अचानक जमींदार ठाकुर श्यामदेव का उस शादी में आगमन होता है, और शादी तीन फेरे हो जाने के बाद रुक जाती है। ग्रामीण पृष्ठभूमि की यह कहानी एक बार फिर -तब विचित्र मोड़ लेती है, जब जमींदार ठाकुर श्यामदेव के बेटे के जीवन में भी उसी तरह की घटना घटती है। उसके पिता द्वारा बचपन में तय की गई लड़की की शादी किसी और के साथ जबरदस्ती करवायी जा रही होती है। इसे देवता का वरदान कहें या कुदरत का करिश्मा, वहां भी शादी तीन फेरे बाद हो कर रुक जाती है। संभवतः इसी घटना से प्रेरित होकर लेखक ने इस उपन्यास का नाम तीन फेरे बाद रखा है। प्रेम प्यार की कहानियों में प्रायः दो तरह के पात्र होते हैं, एक बहुत ही सुलझा हुआ उदार हृदय वाला इंसान और दूसरा बद् और बदनाम। पुराने समय में अगर जमींदार भला इंसान होता था तो उसकी जनता का जीवन बेहद खुशहाल होता था और रियाया भी अपने जमींदार में भगवान की छवि देखती थी। जमींदार श्यामदेव अनेक अवसरांे पर लगान की माफी के साथ-साथ गरीब जनों के शादी विवाह जैसे मामलों में कई आवश्यक चीजें अपनी ओर से प्रदान करते थे। लेकिन सुख के दिन ज्यादा नहीं होते। ठाकुर श्यामदेव की अचानक मृत्यु के बाद, उसका भाई बलदेव के जमींदार बन जाने से रियाया को दमन के चक्रव्युह में पीसना पड़ता है। बलदेव को अपनी कोई संतान नहीं होती है। उसकी पत्नी अपने भतीजे अविनाश को अपने पास रहने के लिए बुला लेती है। अविनाश दमन में बलदेव से चार कदम आगे होता है। उसके पांव अपराध में पहले से ही सने होते हंै। ग्रामीण इलाकों में वार्षिक मेलों का बड़ा ही महत्व होता है। साल में एक बार लगने वाले मेलों में जबरदस्त उमंग और उत्साह देखने को मिलता है। लाॅडस्पीकरों का शोर, हंगामा, नाच-गानें, जादूगर, कुश्ती, घोड़ांे की रेस और नौटंकी इन सब का अलग ही आनन्द और रौनक होती है। बालकों से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक अपनी गांठें खाली कर देते हैं। ग्रामीण इलाके में आज भी औपचारिक शिक्षा प्राप्त करना बड़ा कठिन कार्य होता है। वहां विद्यालय की कमी से लेकर विद्यालय तक आने जाने में भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लेकिन जब परीक्षा परिणाम घोषित होता है तो आस-पास के दस गांव के लोगों को परीक्षा परिणाम जानने की उत्सुकता बन जाती है। परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाना भी एक उत्सव से कम नहीं होता। कई मन देसी घी के लड्डू बांट दिये जाते हैं। अनेक दिनों तक जश्न भी मनता हैं। इन अवसरों पर रिश्ते भी तय हो जाते हंै। ज्यादातर मामलों में गांव की सबसे सुन्दर लड़की का रिश्ता अच्छे अंको से परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले युवक के हाथ में दे दिया जाता है। कस्बों और गांवों में थानेदारों का भी एक अलग ही रूतवा और पहचान होती है। लोग थानेदार से दोस्ती गांठने के लिए बिना कारण कई टीन घी और फलों के टोकरे नजरानों के रूप में भेंट कर देते हैं । मगर ज्यादातर भोले-भाले गांव वाले खाकी वर्दीवालों को देखकर अपना रास्ता बदल लेते हैं। लेकिन इस उपन्यास में पुलिस की अच्छी छवि देखने को मिलती है। मगर अपने व्यक्तिगत जीवन में मैने पुलिस का अधिकांशतः दमनकारी रूप ही देखा है। उपन्यास का कथानक एैसा है कि पाठक शहरी हो या ग्रामीण वह बंधा रहता है। उपन्यास में कई ऐसी घठनाएं हैं जो गंावों और शहरों में समान रूप से देखने को मिलती हैं। दूर देहात के समाज में आज भी रिश्ते कम उम्र में जोड़ दिए जाते हैं। प्रायः ये रिश्ते आगे चलकर बहुत ही मजबूत रूप ले लेता है। बचपन में तय किए गए रिश्ते दो समान रूप से सम्पन्न परिवारों को मित्रता और अपनेपन के प्रगाढ़ सम्बन्ध में बांध देते हैं। इस तरह के रिश्ते कई बार पास पास की जमींदारी में बसने वाले रियाया के लिए खूब मददगार साबित होते हैं और उनका लाभ समाज के सभी वर्गों को मिलता है। एक प्यार का नगमा है मौजों की रवानी है- जिन्दगी कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है। यह गीत जब मैंने लिखा था उससे कुछ समय पहले मैं एक नदी के किनारे बैठ कर, उसकी लहरों के उतार चढाव देखा करता था। बाद में यह गीत प्रत्येक भारतीय की जुबान पर चढ़ गया। एक दिन की बात है एक नाव में घास का गट्ठर लिए कई ग्रामीण महिलाएं और कुछ राहगीर नदी पार कर रहे थे। संयोगवश नाव अपनी बांयी की तरफ जरा सी जोर से हिली। अब क्या था सारी घास वाली महिलाएं एक दूसरे को अपने बचाव में इस प्रकार पकड़ने लगी, जैसे नाव डूबने ही वाली हो। और उन औरतों के बार - बार एक दूसरे को लपक कर पकड़ने के चक्कर मेें नाव और ज्यादा हिलने लगी और अंततः डूब गई। मल्लाह बार - बार यह समझाने का प्रयास करता रहा कि बस शांत बैठी रहो, कुछ भी नहीं होगा, मगर उन महिलाओं के डर ने सबको बहती नदी में गिरा दिया। सौभाग्य से नदी के किनारे पर मौजूद कुद अन्य लोग तैरना जानते थे। जिन्होंने मुश्किल से सभी को बचाया। इस उपन्यास में भी हूबहू उसी प्रकार की घटी सच्ची घटना का वर्णन है। लगता है लेखक डा. प्रदीप ने अपने जीवन में नाव वाली घटना का निकट से साक्षात्कार किया हैं। डा. प्रदीप का एक काव्य संग्रह अंजलि जिसमें कविता के विविध रंग थे, सन् - 2002 में बालाजी प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुई थी। इस काव्य संग्रह को काव्य प्रेमियांे में काफी सराहा गया था। इनकी रचनाएं स्तरीय पत्र -पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। इनकी कई कहानियां तो ऐसी हैं कि यदि उन पर फिल्म बने तो वे सुपर हिट साबित हांेगी। मैंने अनेक हिट फिल्मों के गीत लिखे है और मैं वास्तव में मैं एक गीतकार हूं । उपन्यास लिखना मेरा शौक नहीं रहा। ’तीन फेरे बाद’ को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि मुझे भी उपन्यास लिखना चाहिए। प्रस्तुत उपन्यास अच्छी है, सामाजिक उपन्यासों के पाठको यह निश्चित तौर पर पसंद आएगा। मेरी कोटि कोटि शुभकामनाएं, संतोष आनन्द गीतकर l

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