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छँटते हुए चावल
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छँटतेहुए चावल — 14कहानियों का संग्रह

लेखिका:नीतू सुदीप्ति `नित्या`

चावलचुनते - बिनते हम बहनें **** आज हर कोई चावल छांट रहा है। आप भी छांटिएं .... बड़ामजा है। सुबह चौपाल पर या चाय दुकान पर , ऑफिस ब्रेक में या बस ट्रेन मेंहम सभी चावल ही तो छांटते हैं।जब खुद के जीवन के अनुभव कड़वे होते हैं। तब कलम मेंताकत खुद-ब-खुद आ जाती है। इस कथन को पूर्ण रूप से चरित्रार्थ, नीतूसुदीप्ति नित्याजी कीकिताबछँटतेहुए चावलकरतीदिखाई देती है।

स्त्री विमर्श पर उनके द्वारा लिखी गयी यह किताब, आज के मध्यम वर्गीय एवंनिम्वर्गीय औरतों का परिचय करवाती नज़र आती है। किताब की पहली कहानी छँटतेहुए चावलमें उन्होंने चॉल में रहने वाले लोगों, खासकर औरतों के जीवन को अच्छे ढँग से उतारा है। कहानी के माध्यम से उन्होंने यह बताया है की औरतों के समूह में एकनेता (नेतृत्व) होती है। पूरे चॉल की महिला उसके आगे पीछे लगी रहती है। कहानी के अंत में सरिता के द्वारा कहे गए संवाद में पति के जाने के बाद हम औरतों के पास कोई काम नहीं होता है। तो चावल छाँटते वक़्त किसी की बुराई कर लेते हैं। 

इस पंक्ति में कहानी का सार नज़र आ जाता है। सरिता औरतों की सच्चाई भी बता देती है, और साथ में यह भी बता देती हैं कि इस काम में उसे और बाकी औरतों को रस की प्राप्ति होती है। किताब की बात करूँ, तो इस कहानी संग्रह में चौदह कहानी आपको पढ़ने को मिलेगी। अधिकतर कहानी सुखद अंत का एहसास कराते ख़त्म होती है ।

कुछ ही कहानी दुःखद अंत के साथ ख़त्म हुई है। बिछावनकहानी का अंत आपको झकझोर कर के रख देगी। लेकिन फिर कहानी काला अध्यायमें लेखिका दोहरावपन का शिकार होती दिखती है। ऐसी कहानी बहुत लेख़क पहले भी लिख चुकेहैं। पर जैसे ही आप कहानी आस भरा इंतज़ारकी ओर बढिएगा , आपको एक दफा, यकीन मानिए प्रेमचंद" जी की याद जरूर आ जायेगी। लीला के मन में पूरी और रोटी का जो अंतर्द्वंद्व चल रहा था, वह सही मायने में अमीरी-गरीबी के खाई को दिखाती है।

क्षेत्रीयता का प्रभाव भी किताब में नज़र आता है। माफ करनाकहानी में छठ पूजा के दृश्य बड़े मनोरम तरीके से लिखे गए हैं। लोकभाषा के कुछ शब्दों के इस्तेमाल से कहानी में जान और बढ़ गयी है। पाठक इस चीज़ से और अच्छे तरीके से जुड़ पाएंगे।

कहानियाँ पढ़ते वक्त आपको यह एहसास होगा की यह सभी पात्र हमारे आस - पास ही हैं । पर हमें नज़र क्यों नहीं आते? क्योंकि हमारे पास एक लेखक वाली नज़र नहीं होती ।

एक विनती और कहानी पढ़ने से पहले, इस किताब में लिखी आत्मसंवादअवश्य पढ़िए। किताब से और अच्छे तरीके से आप जुड़ सकेंगे।

एक समीक्षक


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